खट्टर कका दलान पर बैसल भाङ घाटैत छलाह । हमरा अबैत देखि बजलाह— हाँ…हाँ….ओम्हर मरचाइ रोपल छैक, घूमि कऽ आबह ।
हम कहलिऐन्ह।— खट्टर कका, आइ जयवारी भोज छैक, सैह सूचित करय आयल छी ।
खट्टर कका पुलकित होइत बजलाह…बाह बाह ! तखन सोझे चलि आबह । दु एकटा धङ्घेबे करतैक त की हैतैक ? …हँ, भोजमे हैतैक की सभ ?
हम—दही चूडा चीनी ।
खट्टर कका— बस, बस, बस । सृष्टिगमे सभ सँ उत्कृ ष्टू पदार्थ यैह थीक । गोरसमे सभ सँ माँगलिक वस्तु— दही, अन्न मे सभक चूडामणि—चूडा, मधुरमे सभक मूल—चीनी । एहि तीनूक सँयोग बूझह तै त्रिवेणी—सँगम थीक । हमरा त त्रिलोकक आनन्दभ एहिमे बूझि पडैत अछि । चूडा…भूलोक, दही…भुवर्लोक, आ चीनी…स्वकर्लोक ।


